शनिवार, 28 नवंबर 2015

स्त्रीविरोधी मानसिकता के खिलाफ हैप्पी टू ब्लीड अभियान




सुशील स्वतंत्र 

पुरानी परंपरा के नाम पर केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 साल से बड़ी लड़की और 50 साल से छोटी स्त्री का प्रवेश प्रतिबंधित है| इसके पीछे बहुत ही ओछी और घिनौनी मानसिकता है कि महिलाएं मंदिर को अपवित्र कर देंगी क्यूंकि यह पता लगाना मुश्किल है कि किसी महिला का मन्दिर प्रवेश के समय मासिक धर्म चल रहा है या नहीं| मंदिर प्रशासन ने इसलिए सीधे-सीधे 10 साल से बड़ी लड़की और 50 साल से छोटी स्त्री के मंदिर में प्रवेश पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया| 2006 में कन्नड़ अदाकारा जयामाला ने मंदिर में प्रवेश करने और मूर्तियों को छूने का दावा किया था| इस बात पर बहुत हंगामा हुआ था| मन्दिर प्रशासन ने जयामाला पर मुकदमा भी दर्ज़ करवा दिया था| इसके बाद दिसम्बर 2011 में आंध्र प्रदेश की रहने वाली 35 वर्षीय सरस्वती ने भी मंदिर में प्रवेश किया और इस बात पर बड़ा हंगामा हुआ|

फिर एक बार सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश का मामला गर्म तब हो गया जब त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने कहा कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति तभी दी जाएगी जब उनकी शुद्धता की जांच करने वाली मशीन का आविष्कार हो जाएगा| यह बात पर देशभर की महिलाओं ने ऐतराज जताया| पटियाला की रहने वाली निकिता आज़ाद ने फेसबुक पर एक मुहिम शुरू की है, जिसका नाम दिया - 'हैप्पी टू ब्लीड' | फेसबुक पर हैश टैग #HappyToBleed टाईप करके इस अभियान तक पहुंचा जा सकता है| इस अभियान के माध्याम से निकिता ने सभी महिलाओं से अपील की गई कि वे मासिक धर्म को लेकर पुरुषवादी घिनौनी मानसिकता का जवाब दें और वो चार्टपेपर या सेनिटरी नैपकिन लेकर अपनी तस्वीर पोस्ट करें ताकि सदियों पुराने इस पितृसत्तात्मक समाज के शर्मिंदा करने वाले इस खेल का विरोध किया जा सके| देखते ही देखते यह मुहीम सोशल मीडिया में वायरल हो गई| प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई| स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर इस मुहीम के समर्थन और ब्राह्मणवादी स्त्रीविरोधी मानसिकता के खिलाफ तस्वीरें और कमेन्ट पोस्ट किए| इतना ही नहीं बड़ी संख्या में पुरुषों ने भी स्त्रियों के सम्मान और अधिकार के लिए इस अभियान का समर्थन किया| मासिक धर्म को लेकर समाज महिलाओं को हीन दृष्टि से न देखे, इन भ्रांतियों और अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ संभवतः पहली बार सोशल मीडिया पर भारतीय महिलाएं इतनी मुखर नजर आ रही हैं| 












इस संवेदनशील मसले पर बात करते हुए कुछ सवाल ऐसे हैं जिसका जवाब धर्म के इन तथाकथित झंडाबरदारों से लेना जरूरी है : 



  1. क्या कारण है कि कोई स्त्री, जिसे मासिक धर्म के दौरान रक्तस्त्राव होने के कारण अपवित्र मानकर सबरीमाला जैसे प्रसिद्द मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं दिया जाता है, उसी स्त्री के गर्भ में पूरे नौ महीने उसी तथाकथित गंदे खून में पलने वाले बच्चे को यही समाज स्वीकार कर लेता है?
  2. पवित्रता और अपवित्रता की परिभाषा गढ़ने का अधिकार किसको है, यह कौन तय करेगा?  
  3. स्त्री को कुदरत ने गर्भाशय दिया है, क्या इसमें औरत का क्या दोष है?
  4. जिस प्रक्रिया से मानवजाति की उत्पत्ति होती है, उसे अपवित्र कहने का हक़ किसी मन्दिर प्रशासन को किसने दिया?
  5. जहाँ एक ओर हिन्दू 52 शक्तिपीठों में से एक कामख्या में योनी की पूजा करते हैं, वही केरल के प्रसिद्द सबरीमाला मन्दिर में मासिक धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रवेश क्यूँ नहीं करने देते? 
    




शुक्रवार, 2 मई 2014

किस हवा में है यह लहर

महेश राठी 
मीडिया विशेषकर टीवी मीडिया पर भाजपा का लहर गान है कि रूकने का नाम ही नही ले रहा है। हरेक मिनट टीवी चैनलों पर भाजपाई विज्ञापनों की आमद के बढ़ने के साथ ही आम चुनावों के छह चरण के मतदान के बाद कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया ने भी अब लहर गान को सुनामी गान में बदल दिया है। लहर गान के सुनामी गान में बदल जाने की तर्ज पर ही भाजपाई नेताओं की जीत के दावों में भी अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है। मगर दोनों के सूचकांक में उछाल की यह समानता अब हास्यास्पदता की सीमाओं में प्रवेश कर चुकी है। अभूतपूर्व जीत के दावों की स्वयंभू दावेदारी का विश्लेषण यदि विगत चुनावों में भाजपा को प्राप्त मतों और सफलता के आधार पर करें तो यह लहर सुनियोजित और प्रायोजित हवाबाजी में बदलती दिखाई देती है।

यदि भाजपा को 2009 में प्राप्त मतों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण किया जाए तो उसके जनाधार की वास्तविकता जाहिर हो जाती है। विगत आम चुनाव 2009 में भाजपा ने लोकसभा की कुल 433 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 170 सीटों पर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा अपनी जमानत भी नही बचा सका था। अर्थात कुल 263 सीटों पर ही भाजपा की जमानत बच सकी थी और जमानत बचने का अर्थ यह भी नही है कि उसे प्राप्त मतों की संख्या जमानत बचने के आसपास अथवा काफी बड़ी थी। भाजपा को मिलने वाले मतों की संख्या कई सीटों पर आश्चर्यजनक ढंग से बेहद कम थी तो कही वोट बंट जाने के कारण 20-24 प्रतिशत मतों के आधार पर ही उसकी जीत संभव हुई थी। 433 में से 202 सीटें ऐसी थी जिस पर भाजपा बामुश्किल डेढ़ लाख के आंकड़ें तक ही पहुँच सकी थी जबकि इनमें से कई सीटों पर जीत हासिल करने वाले विरोधी उम्मीदवारों को 3 से 4 लाख तक मत हासिल हुए थे। इसके अलावा इन 202 सीटों में 50 सीटें ऐसी थी जिस पर भाजपा 1 लाख से भी कम वोटों में सिमट गई थी। इस 1 लाख के आंकडें में भी अधिसंख्य सीटें ऐसी हैं जहां प्रमुख विपक्षी दल की प्राप्त मत संख्या 70 हजार से कम थी। इसके बाद 50 हजार से भी कम वोट पाने वाली सीटों की संख्या भी 50 थी और जिन सीटों पर भाजपा को 30 हजार से भी कम वोट प्राप्त हुए वह संख्या भी 44 थी। साथ ही देश भर में 14 सीटें ऐसी भी थी जहां भाजपा 10 हजार के आंकडें को भी नही छू पाई थी। इसमें आंन्ध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर में कुछ ऐसी भी सीटें थी जहां भाजपा महज 2-3 हजार के आंकड़ें में ही सिमट कर रह गई थी। वैसे भाजपा को सबसे कम 247 वोट लक्षद्वीप में प्राप्त हुए थे। इन प्राप्त मतों के आंकड़ें में एक दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि इस चुनाव में कम से कम बिहार और असम में उसके 2009 के वह सहयोगी जिनके जनाधार पर खड़े होकर बिहार और असम में उसने प्रभावी प्रदर्शन किया था वह अब उसका साथ छोड़ चुके हैं। बिहार में अति पिछड़े, महादलित और अल्पसंख्यक वोट मिलने का कारण नीतीश कुमार थे और अब गिरिराज सिंह सरीखे भूमिहारों के वर्चस्व वाली भाजपा वर्तमान चुनाव में उस वोट को प्राप्त करने की सिर्फ कल्पना ही कर सकती है। यदि बिहार में भाजपा की कोई लहर होती तो कांग्रेस-राजद गठबंधन में हाशिये पर धकेल दिये गए और 2009 में एक भी सीट हासिल नही कर पाने वाले रामविलास पासवान को भाजपा 10 सीटें तोहफे में नही देती। कमोबेश यही स्थिति असम में भी है। असम में पिछले आम चुनाव में भाजपा का असम गण परिषद के साथ गठजोड़ था जिसके कारण वह प्रदेश में कुछ सीटें हासिल कर पाई थी। परंतु इस चुनाव में अगप समझ चुकी है कि उसे पूर्व में किये गए गठजोड़ का कोई लाभ नही वरन् नुकसान ही हुआ है और भाजपा को इसका भरपूर लाभ मिला था। इसीलिए अबकी बार तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा को अकेले ही मैदान में उतरना पड़ा है। यदि असम के चुनाव विश्लेषकों की माने तो पिछले चुनाव के मुकाबले असम में भाजपा को नुकसान होना तय है और कोई भी लहर उसे यह नुकसान होनी से बचा नही सकती है।

अपने चिर परिचित बड़बोले अंदाज में भाजपा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और अन्य नेता इस नुकसान पर पर्दा डालने के लिए कह रहे हैं कि उनके गठबंधन में 28 सहयोगी हैं। परंतु इस गठजोड़ का दिलचस्प पहलू यह है कि अकाली दल, पासवान, शिवसेना को छोड़कर देश में कोई इनका नाम भी जानता नही है। इन नए सहयोगियों का प्रभाव कुछ राज्यों के अलग अलग कुछेक जिलों को छोड़कर कही नही है। वास्तव में यह भाजपा की अपने सांप्रदायिक अछूतपन को ढ़कने की एक राजनीतिक कोशिश भर है जो कभी किसी व्यापक गठबंधन की शक्ल प्राप्त नही कर सकता है। भाजपा की कोशिश बिहार और उत्तर प्रदेश को केन्द्रीत कर 2014 के इस महासमर को जीतने की थी। बिहार में बेशक वह कितने ही बड़े दावे करें मगर नितिन गड़करी के इस बयान से कि बिहार के डीएनए में जातिवाद है से भाजपा की हार की स्वीकारोक्ति और अनुगूंज स्पष्ट सुनाई देती है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष का यह बयान उनकी और उनकी पार्टी की हताशा को स्पष्टतया अनुवादित करता है।

अब भाजपा में मोदी के हमराज सेनापति अमित शाह और भाजपाई नेताओं की निगाह उत्तर प्रदेश पर आकर टिक गईं हैं। मगर उत्तर प्रदेश की कहानी भी कम रोचक नही है। इसे चाहे हम आंकड़ों की जुबानी सुने अथवा दल बदल के आईने से देखें भाजपा के दावों की वास्तविकता उजागर हो ही जाती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने चुनावी गठजोड़ के तहत 2 सीटें अपना दल को दी है अर्थात भाजपा कुल मिलाकर 78 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इन 78 सीटों में 28 सीटें ऐसी हैं जिसमें हिन्दी भाषी प्रदेशों को अपना मजबूत आधार अथवा गढ़ कहने वाली भाजपा 1 लाख के आंकडें तक भी नही पहुँच सकी थी और इनमें भी 7 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा के लिए 50 हजार का आंकड़ा भी छूना मुश्किल हो गया था। इसके अलावा प्रदेश की 4 सीटें ऐसी भी हैं जहां विकास की चासनी में हिन्दुत्व परोसने वाली पार्टी को 30 हजार का आंकड़ा छूना भी दूभर हो गया था। उत्तर प्रदेश में भाजपा के मजबूत जनाधार की हवाबाजी की कहानी यहीं नही ठहर जाती है। प्रदेश की 10 सीटें ऐसी थी जहां भाजपा जीत से दूर 1.30 के आंकड़ें के नीचे ही सिमट गई थी और लगभग 10 सीटों में यह पार्टी 1.30 से 1.55 हजार के आंकडें पर ही आकर ठहर गई थी। अब हिन्दी प्रदेश में अपने मजबूत आधार के दम पर लहर के दावे करने वाली पार्टी 2009 के आम चुनावों में 48 सीटों पर दौड़ से बाहर रहने के बावजूद भी किसी लहर के दावे करे तो इसे हास्यास्पद दावा नही कहेंगे तो क्या कहेंगे? इसके अलावा इस लहर की हवाबाजी का एक ओर दिलचस्प पहलू यह भी हैं कि प्रदेश की 78 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा के 40 के लगभग उम्मीदवार आयतित हैं। वैसे यह बड़बोली भाजपाई राजनीति और ऐड-नीति के बिल्कुल अनुकूल भी है। इस आयतित माल के दम पर लहर का सबसे अनोखा उदाहरण मुजफ्फरनगर के भाजपा उम्मीदवार संगीत सोम हैं। जिस संगीत सोम को भाजपा हिन्दु हित रक्षक चैंपियन के बतौर पेश कर रही है वह पिछले आम चुनाव में मुजफ्फरनगर से ही सपा के उम्मीदवार थे और वही आजम खान उनके आदरणीय नेता थे जिनको सोम देशद्रोही कहकर खबरों में बने रहने की कोशिश करते हैं। सलेमपुर, कैसरगंज, सीतापुर, आंवला, हरदोई, धौरहरा, मिश्रिख, मोहनलाल गंज, इटावा, हमीरपुर, बलिया आदि 40 से भी अधिक ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा को अपने पुराने और स्थापित नेताओं पर विश्वास नही है कि वह कोई लाभप्रद परिणाम पार्टी को दे पायेंगे। लहर से सुनामी बन चुकी तथाकथित मोदी लहर के बावजूद भी भाजपा की लाचारी देखिए कि वह अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नही है और दल बदल के इस खेल में ना उसे दागियों को शामिल कराने में गुरेज है ना ही दुर्दांत अपराधियों को अपना बनाने में शर्म आ रही है। दागियों और अपराधियों के लिए पलक पावड़े बिछाने वाली राजनीति के सुपरमैन मोदी पांखड के नए मानक स्थापित करते हुए कह रहे हैं कि चुनाव जीतने के बाद वह सारे दागियों को जले भेज देंगे। अब दागियों पर दांव खेलने वाली भाजपा ही बता सकती है कि उनकी निगाह में दागियों की यह नई परिभाषा क्या है?

दरअसल तमाम विरोधाभासों के बावजूद मोदी लहर के इस माहौल को गढ़ने की कोशिश कोर्पोरेट मीडिया, प्रायोजित सर्वे और भाजपा की जुगलबंदी का नतीजा है। असल में देश के तमाम राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनोें को जिस बेशर्मी के साथ कांग्रेस नीत यूपीए-2 के शासनकाल में कार्पोरेट द्वारा हथियाया गया उससे कार्पोरेट घराने की आकांक्षाओं को नए पंख लग गए हैं और अब देशी विदेशी कार्पोरेट विकास के नाम पर बाकी बचे संसाधनों पर काबिज होकर इस लूट को नई उचांईयां देने की फिराक में है। इसी क्रम में देश के मीडिया ने यूपीए-2 की जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों और नव उदारवाद की विफलताओं के कारण के रूप में विकास की धीमी गति और नीतिगत अपंगता के रूप में पेश करने का काम किया है। साथ मीडिया ने लंबे समय से इस नीतिगत अपंगता से निकलने और विकास को गति देने के लिए मजबूत नेता और कड़े निर्णयों की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए प्रचार करने का काम किया जिससे एक देश के एक वर्ग विशेष में तथाकथित मजबूत नेता और उसके कड़े फैसलों के लिए जगह बनाई जा सके। जाहिर है मीडिया द्वारा तैयार मजबूत नेता का यह खाका भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को ही ध्यान में रख खींचा गया था और कड़े फैसलों का अर्थ होगा नव उदारीकरण की राह पर चलते हुए बचे हुए संसाधनों और राष्ट्रीय संपत्ति का निजीकरण। विकास के इस कार्पोरेट माॅडल को लागू करने की तैयारियों के क्रम में ही कुछ कार्पोरेट घरानों देश के विख्यात मीडिया घरानों पर कब्जे करने की मुहिम तेज की और उसके उपरांत वह पहले तैयार पटकथा के अनुसार ही मोदी लहर अर्थात कार्पोरेटी विकास को सुर देने में लग गए। परंतु बड़ा सवाल यह है कि तथाकथित विकास और सुशासन की चासनी में लिपटी हिन्दुत्व की यह लहर उन जातीय सवालों, विभाजन और प्रतिरोध को कैसे खत्म कर पायेगी जिसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के दम पर ही उनकी यह शोषणकारी व्यवस्था जिंदा है?



----------------------------------------------------------------
लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं । 

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

जनजागृति के नायक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की गोली मार कर हत्या

स्वर्गीय डॉ. नरेंद्र दाभोलकर
जादू-टोना, चमत्कार जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ 25 वर्षो से जागरूकता अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की मंगलवार को पुणे में बाइक सवार दो युवकों ने गोली मार कर हत्या कर दी गई। वारदात के विरोध में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पुणे में बुधवार को सर्वदलीय बंद का आह्वान किया गया है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू करने के साथ ही हमलावरों की गाड़ी का नंबर तथा एक हत्यारे का स्केच जारी किया है। वहीं, मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण और गृहमंत्री आरआर पाटिल ने दाभोलकर की मौत को अपूरणीय क्षति बताया है। चह्वाण ने हत्यारों का सुराग देने वाले को 10 लाख रुपए का इनाम घोषित किया है।

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर सुबह की सैर के बाद घर लौट रहे थे। करीब 7.20 बजे ओंकारेश्वर पुल पर पीछे से आए बाइक सवार युवकों ने उन पर गोलियां दाग दीं। सिर और पीठ पर गोलियां लगने से दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस को हमलावरों की बाइक का नंबर पता चल गया है। प्रत्यक्षदर्शियों की मदद से एक हत्यारे का स्केच भी तैयार किया गया है। पुलिस घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाल रही है।

पुलिस की मानें तो उनकी हत्या पूर्वनियोजित तरीके से की गई। दो हमलावर घात लगाए बैठे थे और जैसे ही डॉ दाभोलकर सुबह की सैर पर निकले ओंकारेश्वर मंदिर के पास उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया। उन्हें चार गोलियां लगीं।
बुरी तरह घायल डॉ. दाबोलकर को ससुन अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक, डेक्कन जिमखाना पुलिस स्टेशन, मनोहर जोशी ने बताया कि हमलावर पीछे से आए और गोलियां चलाकर मोटरसाइकिल पर सवार होकर भाग गए। सिर के पिछले हिस्से में दो गोलियां लगी हैं। डॉ. दाभोलकर के हत्यारों की मोटरसाइकिल का नंबर 7756 था। पुलिस ज्यादा जानकारी के लिए इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगालने में जुटी है। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक हमलावरों की उम्र 25 से 27 साल थी। एक हमलावर ने टोपी पहन रखी थी और नाम पूछने के बाद उसने बेहद करीब से डॉ. दाबोलकर पर गोली चलाई। सूत्रों की मानें तो डॉ. नरेंद्र दाबोलकर मंगलवार को ही अंधश्रद्धा निर्मूलन विधेयक को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे।

वे आजकल अमानवीय रीतियों एवं अंधविश्वासों के खात्मे के लिए प्रस्तावित अंधविश्वास और काला जादूरोधी विधेयक पारित कराने के लिए महाराष्ट्र सरकार पर दबाव डालने का अभियान चला रहे थे। कहा जा रहा है कि इससे वरकारी पंथ से जुड़ा एक वर्ग डॉ. दाबोलकर के खिलाफ हो गया था। हाल ही में कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने उन्हें धमकी भी दी थी। 

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने 80 के दशक में अंधविश्वास, कर्मकांड के खिलाफ नासिक जिले से जागरूकता अभियान शुरू किया था। 1989 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एमएएनएस) का गठन किया जो वैज्ञानिक तरीके से जादू-टोना और अंधविश्वासों को गलत सिद्ध करता है। संगठन की 200 शाखाओं के पांच हजार कार्यकर्ता गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाते हैं। दाभोलकर के प्रयासों से ही महाराष्ट्र में जादू-टोना विरोधी विधेयक भी पेश किया गया, लेकिन कुछ सदस्यों के विरोध के कारण पिछले कई सत्रों में यह पारित नहीं हो सका।

डॉ.नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से उनके वैचारिक विरोधी भी सकते में हैं। सनातन संस्था एवं हिंदू जनजागृति समिति ने घटना को दुखद बताया है। साथ ही निजी रंजिश के बिंदु पर भी छानबीन किए जाने की मांग की है।
हिंदू जनजागृति के समन्वयक सुनील घनवट ने हत्याकांड की निंदा करते हुए कहा, हालांकि कई मुद्दों पर हमारा दाभोलकर से वैचारिक मतभेद था, लेकिन अंधविश्वासों के खिलाफ हम उनके अभियान के प्रशंसक है। सनातक संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक ने कहा, संगठन को डॉ.दाभोलकर की मौत से गहरा दुख पहुंचा है। उतना ही धक्का इस बात से भी लगा है कि कुछ लोग सनातन संस्था को इसके लिए दोषी मान रहे हैं।

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

संविधान में ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि की इजाजत नहीं : गृह मंत्रालय

नई दिल्ली : महात्मा गांधी को सरकार द्वारा ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि नहीं दी जा सकती क्योंकि संविधान में शैक्षणिक अथवा सैन्य उपाधियों के अलावा अन्य कोई उपाधि देने की इजाजत नहीं है। गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी।

लखनऊ की एक छात्रा ऐश्वर्या पाराशर द्वारा सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांगी गई जानकारी के जवाब में गृह मंत्रालय ने उसे बताया कि महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ घोषित करने के बारे में राष्ट्रपति से की गई उनकी अपील पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है क्योंकि संविधान की धारा 8 (1) शैक्षणिक और सैन्य उपाधियों के सिवाय और कोई उपाधि देने की इजाजत सरकार को नहीं देती।

ऐश्वर्या ने महात्मा गांधी के बारे में ब्यौरा चाहते हुए बहुत सी आरटीआई दाखिल की थीं। उन्होंने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहे जाने की वजह भी जाननी चाही थी। इसके जवाब में उन्हें बताया गया कि महात्मा गांधी को ऐसी कोई उपाधि नहीं दी गई। इसपर 11वीं कक्षा की इस छात्रा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ घोषित किए जाने के संबंध में अधिसूचना जारी करने का आग्रह किया।

ऐश्वर्या ने यह जानने के लिए आरटीआई दाखिल की कि उसके आग्रह पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने क्या कार्यवाही की। उसकी अर्जी इस निर्देश के साथ गृह मंत्रालय को भेजी गई थी कि उसके आग्रह पर क्या कार्यवाही की गई इसका खुलासा किया जाए। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का खिताब न दिए जाने के लिए उपरोक्त वजह बताई।
(श्रोत)