शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

राजीव जी की स्मृति में मनाएंगे स्वदेशी दिवस

ख़बर 
सरेबाज़ार के लिए सुशील कुमार 
नई दिल्ली, दिसंबर 2, 2010    

हरिद्वार, प्रतिनिधि: पतंजलि योग पीठ दिवंगत राजीव दीक्षित जी की स्मृति में हर साल तीस नवंबर को स्वदेशी दिवस मनाएगी। राजीव दीक्षित जी ने अपने संघर्ष के बलबूते जीवन की विषम से विषम परिस्थितियों पर जीत हासिल की। अब पतंजलि योग पीठ ने राजीव जी के अधूरे सपनों को मूर्त देने का संकल्प लिया है।

कनखल स्थित श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा में योग पीठ ने राजीव दीक्षित जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। सैकड़ों लोगों ने दो मिनट का मौन धारण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना की। स्वामी रामदेव जी की राजीव दीक्षित से पहली मुलाकात कनखल में ही हुई थी, तो अंतिम विदाई की जगह भी कनखल ही बनी। राजीव दीक्षित को स्वामी रामदेव जी पिछले एक-डेढ़ दशक से बेहद करीब से जानते थे। स्वामी रामदेव जी के लिए तो राजीव दीक्षित करोड़ों हाथों के बराबर काम करते थे। स्वामी रामदेव जी बोले कि राजीव दीक्षित ज्ञान के अथाह भंडार थे। उनकी बौद्धिक क्षमता के कारण उन्हें चलता-फिरता ज्ञान कोष भी कहा जाता था। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि राजीव दीक्षित प्रभु की ऐसी कृति थी, जिसे अब चाह कर भी नहीं बनाया जा सकता है। वे समृद्धि एवं खुशहाल भारत बनाने के सपनों को आधे सफर में छोड़कर चले गए। उन्होंने कहा राजीव जी के रग-रग में स्वदेश व सिर्फ स्वदेश ही बसा हुआ था। स्वामी रामदेव जी ने उनके सपनों को मूर्त रूप देने का संकल्प लिया। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि राजीव दीक्षित जी का स्वदेशी के प्रति गहरा व अटूट अनुराग था। उनकी याद में हर साल तीस नंबर को स्वदेशी दिवस मनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि उप्र अलीगढ़ के नहा गांव में तीस नवम्बर 1967 में राजीव दीक्षित जी का जन्म हुआ है। उन्होंने इलाहाबाद से बीटेक एवं कानपुर से एमटेक किया था। आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि दिवंगत राजीव दीक्षित जी की स्मृति में भारत स्वाभिमान मुख्यालय का नाम राजीव भवन किया जाएगा। इसका उद्घाटन 5 जनवरी 2011 को किया जाना है।

राजीव भाई का निधन

सरेबाजार के लिए 
सुशील कुमार
नई दिल्ली 
दिसंबर 1 , 2010
   
क ऐसी क्षति जिसकी भरपाई नामुमकिन है! लेकिन यह महज दुःख कि बात नहीं है कि राजीव भाई नहीं रहे, एक हैरानी की बात भी है कि देश की मिडिया ने उनके निधन की ख़बर  देशवासियों को देने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखायी | भला क्यों करती है मीडिया ऐसा वर्ताव ? इस दोहरे चरित्र का क्या राज है? जवाब साफ़ है कि राजीव भाई पूंजीपतियों और विदेशी कंपनियों के खिलाफ लड़ रहे थे और मीडिया उन्ही के हाथों की कठपुतली है| उस आदमी को कैसे प्रसिद्धी दे सकती है मीडिया जो पूंजीपतियों की मुखालफत करता हो, चाहे यह उनके मृत्यु का समाचार ही क्यूँ न हो | धिक्कार है ऐसी पत्रकारिता पर, धिक्कार है ऐसे मीडिया घरानों पर| 

चड्डी-बनयान के रंग और अवैध संबंधो का सनसनीखेज खुलासा करने वाले पत्रकारों, समय रहते जाग जाओ, वरना इतिहास तुम्हे कभी माफ़ नहीं करेगा !
बहरहाल, "सरेबाज़ार" किसी पूंजीपति या विदेशी कंपनी की रखैल नहीं है, इसलिए हम राजीव भाई के स्वदेशी आन्दोलन की अलख जला कर रखेंगे| हमारे नए पाठक स्वर्गीय राजीव भाई के बारे में जानने के लिए यहाँ चटका लगायें ! 
  


रविवार, 21 नवंबर 2010

ई-हिन्दी का दौर

बिनोद कुमार सिंह 
नवम्बर 22, 2010   
नई दिल्ली  

ब्लॉग की लोकप्रियता दिनों-दिन बढती जा रही है | ब्लॉग के पहले के दौर को देखें तो ऐसे बहुत लेखक मिलेंगे जो आजीवन लिखते रहे और कहीं छप नहीं पाए | असीम संभावनाओं के बावजूद लेखकों को छपने का मौका नहीं मिल पाता था, जिसके कारण एक बड़ा पाठक वर्ग उनकी रचनाओं से वंचित रह जाता था | जिनकी रचनाओं को छप कर पाठकों तक पहुँचने का अवसर मिलता था, वे भी प्रकाशक की मनमानी का शिकार होते थे | यह अकारण नहीं है कि प्रेमचंद जैसे महान कथाकार को भी प्रकाशन व्यवसाय में हाथ डालना पड़ा था | 

ब्लॉग ने लेखक और पाठक के बीच की दूरी को मिटा दिया है | यह दौर सूचना क्रांति के साथ-साथ अभिव्यक्ति की क्रांति का भी है | दिल्ली शहर जो लेखन की राजधानी भी बनी रही है, यहाँ ऐसे भी कई लेखक और पत्रकार हैं जिनकी स्थिति हिन्दी कवि 'पॉल गोमरा' (उदय प्रकाश की कहानी 'पॉल गोमरा का स्कूटर' का मुख्य पात्र) से बेहतर नहीं है | 

पटना, मुंबई, दिल्ली सहित देश के कई शहरों में साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं जो अपने गिरोह के बाहर के रचनाकार को लेखक नहीं मानते | ब्लॉग के आने से गिरोह्बाज़ी और गुटबाजी का रंग निःसंदेह फीका पड़ा है और स्वतंत्र लेखकों की रचनाएँ पाठकों तक पहुँच रही हैं | 

ब्लॉग पर न राजसत्ता और न ही विज्ञापनदाता का प्रभाव काम करता है और यही कारण है कि हिन्दी समाचारों व साहित्य के ब्लॉग और वेबसाइट बेबाकी और निष्पक्षता से पठनीय सामग्री उपलब्ध करवा पा रहे हैं | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ब्लॉग लेखन के चलन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक नया आयाम दिया है | ब्लॉग के माध्य्यम से हिन्दी के ऐसे बहुत लेखक सामने आये हैं जिनकी जीविका केवल लेखन पर आधारित नहीं है | ऐसे लोग बिना किसी डर-भय और दबाव के लिख रहे हैं | इन नए लेखकों पर गुटबाजी का कोई प्रभाव नहीं है | दिन-ब-दिन नए ब्लोगरों का लेखन जगत में शामिल होना और पाठकों की लगातार बढती संख्या इस ओर इशारा कर रही है कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में नया उबाल आने वाला है | 

लेखन को नई दिशा मिल रही है और लिखने वाले अभिव्यक्ति के खतरे उठा रहे हैं | लेखकों के जज्बे, ब्लोगिंग और ई-हिन्दी के इस दौर को सलाम |