रविवार, 21 नवंबर 2010

ई-हिन्दी का दौर

बिनोद कुमार सिंह 
नवम्बर 22, 2010   
नई दिल्ली  

ब्लॉग की लोकप्रियता दिनों-दिन बढती जा रही है | ब्लॉग के पहले के दौर को देखें तो ऐसे बहुत लेखक मिलेंगे जो आजीवन लिखते रहे और कहीं छप नहीं पाए | असीम संभावनाओं के बावजूद लेखकों को छपने का मौका नहीं मिल पाता था, जिसके कारण एक बड़ा पाठक वर्ग उनकी रचनाओं से वंचित रह जाता था | जिनकी रचनाओं को छप कर पाठकों तक पहुँचने का अवसर मिलता था, वे भी प्रकाशक की मनमानी का शिकार होते थे | यह अकारण नहीं है कि प्रेमचंद जैसे महान कथाकार को भी प्रकाशन व्यवसाय में हाथ डालना पड़ा था | 

ब्लॉग ने लेखक और पाठक के बीच की दूरी को मिटा दिया है | यह दौर सूचना क्रांति के साथ-साथ अभिव्यक्ति की क्रांति का भी है | दिल्ली शहर जो लेखन की राजधानी भी बनी रही है, यहाँ ऐसे भी कई लेखक और पत्रकार हैं जिनकी स्थिति हिन्दी कवि 'पॉल गोमरा' (उदय प्रकाश की कहानी 'पॉल गोमरा का स्कूटर' का मुख्य पात्र) से बेहतर नहीं है | 

पटना, मुंबई, दिल्ली सहित देश के कई शहरों में साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं जो अपने गिरोह के बाहर के रचनाकार को लेखक नहीं मानते | ब्लॉग के आने से गिरोह्बाज़ी और गुटबाजी का रंग निःसंदेह फीका पड़ा है और स्वतंत्र लेखकों की रचनाएँ पाठकों तक पहुँच रही हैं | 

ब्लॉग पर न राजसत्ता और न ही विज्ञापनदाता का प्रभाव काम करता है और यही कारण है कि हिन्दी समाचारों व साहित्य के ब्लॉग और वेबसाइट बेबाकी और निष्पक्षता से पठनीय सामग्री उपलब्ध करवा पा रहे हैं | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ब्लॉग लेखन के चलन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक नया आयाम दिया है | ब्लॉग के माध्य्यम से हिन्दी के ऐसे बहुत लेखक सामने आये हैं जिनकी जीविका केवल लेखन पर आधारित नहीं है | ऐसे लोग बिना किसी डर-भय और दबाव के लिख रहे हैं | इन नए लेखकों पर गुटबाजी का कोई प्रभाव नहीं है | दिन-ब-दिन नए ब्लोगरों का लेखन जगत में शामिल होना और पाठकों की लगातार बढती संख्या इस ओर इशारा कर रही है कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में नया उबाल आने वाला है | 

लेखन को नई दिशा मिल रही है और लिखने वाले अभिव्यक्ति के खतरे उठा रहे हैं | लेखकों के जज्बे, ब्लोगिंग और ई-हिन्दी के इस दौर को सलाम | 

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