गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

ब्लड ईज थिकर दैन वाटर

 सरेबाजार के लिए 
सुशील कुमार 
दिल्ली , 17 फरवरी, 2011
sarebazar@gmail.com


त्ता के लोभियों ने जंग-ए-आज़ादी के दौर से ही मुसलमानों के साथ खेलना शुरू कर दिया था | कभी मज़हबी हिंसा में झोंक कर तो कभी भेदभाव करके, मुस्लिम कौम का महज़ वोट की राजनीती करने वालों नें भरपूर दोहन किया है | नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में बाँट दिया लेकिन भारतीय मुसलामानों को अपनी मिटटी जुदा न कर सके | जिस देश में अशफाकुल्लाह जैसे शहीद रत्न नें भारत माँ के दामन को दागदार होने से बचाने के लिए अपनी  जान की कुर्बान कर दी, उस देश का मुसलमान जिन्ना के बहकावे में भला कैसे आ सकता था ?

मुल्क का बंटवारा होना जब लगभग तय हो गया था, उसी समय लाहौर लाँ कॉलेज में एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना का भाषण हुआ | कुलदीप नैय्यर (वरिष्ट पत्रकार) उस समय वहां पढ़ाई कर रहे  थे | जब जिन्ना का भाषण ख़त्म हुआ तो नैय्यर साहब नें उनसे पुछा कि जब देश बाँट दिया जायेगा और उसके बाद कभी अगर भारत पर कोई आंच आती है तो पाकिस्तान का रुख क्या होगा ? इस सवाल पर जिन्ना ने कहा था "जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर |" मतलब साफ़ था कि भारत-पाकिस्तान का खून का नाता है और खून हमेशा पानी से गाढ़ा होता है | बहरहाल, पचास फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को चिन्हित करके भारत माँ के सीने पर स्वार्थ के खंजर से लकीर खींच कर पाकिस्तान बना दिया गया |

आज लगभग 6 दशक हो गए लेकिन इस देश में मुसलमान बेख़ौफ़ नहीं है | सहमा है, संदिग्ध है और भेदभाव का शिकार है | लम्बी दाढ़ी और सफ़ेद टोपी वाले ये कौन लोग हैं जिन्हें संदिग्ध निगाहों से देखने की मुहीम कुछ अलगाववादी-कट्टरपंथी संगठन चला रहे हैं ? आखिर अपने ही घर में शक के दायरों में कैद होते जा रहे बहन-भाईयों को नजदीक से कोई देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है ? ये लोग जो अपने-अपने तरीकों से राष्ट्र की तरक्की में योगदान दे रहे हैं, आखिर पिछड़े और वंचित क्यूँ हैं? भारत में मुसलमान खुद को ठगा हुआ और बेबस महसूस करने लगे हैं | यहाँ मुसलमान घोषित रूप से काफ़िर तो नहीं कहे जाते हैं लेकिन भेदभाव का शिकार जरूर हैं | आखिर क्या कारण है कि चाहे शिक्षा की बात हो, रोजगार की, स्वास्थ्य की या राजनैतिक भागीदारी की, मुसलमान पिछड़ा हुआ नज़र आता है ? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए इसके राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं पर विचार करना होगा |

भारतीय समाज में धर्म की दखलअन्दाजी जबरजस्त है और जनमानस में इसकी पैठ गहरी है | धर्म के ठेकेदारों को इस बात का इल्म है और वे धर्म की आड़ में अनेक मकसद पूरा कर जाते हैं | यहाँ धर्म में कब राजनीती और राजनीती में कब धर्म का धालमेल हो जाये पता ही नहीं चलता | चाहे कोई भी पंथ या कौम हो, धर्म के नाम पर जनभावना का दोहन करने में पीछे नहीं है | इसी का नतीजा है कि कोई जनसँख्या वृद्धि को किसी एक धर्म की सुनियोजित योजना बताता है तो कोई धार्मिक झाँकियों को अपने धर्मस्थल के सामने से गुजरने देने से अपने इबादतगाह के नापाक हो जाने का प्रचार करता है |  

मेरा एक दोस्त मुझसे हमेशा कहता था - "यार ये मुसलमान अपने मस्जिदों में किसी गैर मुस्लिम को नहीं जाने देते हैं "| मैंने एक दिन उसे चाँदनी चौक बुलाया और फिर जामा मस्जिद ले गया | डरते डरते वह सीढियों पर चढ़ने लगा और बोला  - "यार कुछ होगा तो नहीं ?"  मैंने  उसको यकीन दिलाया कि यह उपर वाले का घर है और यहाँ किसी के आने-जाने पर मनाही नही है | अगर ऐसा होता तो दरवाजे पर ही लिखा होता | हम दोनों गैर मुस्लिम काफी देर तक जामा मस्जिद में रहे और लोगों को बंदगी करते देखते रहे | उस दिन के बाद मेरे दोस्त के नज़रिए में बदलाव आ गया और वह कट्टर से सहिष्णु बन गया |

इसी तरह ज्यादा बच्चे पैदा करने का इल्जाम भी सुनियोजित तरीके से एक धर्म विशेष पर लगाया जाता है जो कि सरासर गलत है | अगर मैं अपने गाँव में देखूं तो एक-एक दम्पत्ति को बारह से पंद्रह बच्चे हैं और वे गैर-मुस्लिम हैं | खुद मेरे चाचा के ग्यारह बच्चे हैं और एक सुप्रसिद्ध भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री को ही देख लीजिये , उनके नौ बच्चे हैं | हिन्दू धर्म ग्रंथों में तो एक दंपत्ति के सौ पुत्र होने की बात कही गयी है |
दुनिया के किसी भी धर्म की पवित्र किताबों में "परिवार नियोजन" के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा है | ये तो बीच में धर्म की ठेकेदारी करने वालों ने लोगों का बुरा हाल बना दिया है | परिवार छोटा हो तो ही सबकी देख-रेख पूरी तरह से हो सकती है लेकिन बड़े परिवार सिर्फ किसी धर्म-विशेष में ही मिलते हैं, ऐसा कहना गलत होगा |

सवाल यह है कि हम अगर दुसरे किसी धर्म को समझने की कोशिश ही नही करेंगे तो सम्मान का भाव कहाँ से आएगा? हमारे विद्यालयों में त्योहारों के लिए दी जाने वाली छुट्टियाँ सिर्फ मौज मस्ती के दिन की तरह होती हैं | जो जिस धर्म से ताल्लुक रखता है उसे तो माँ-बाप या समाज से उस धर्म विशेष के पर्व के लिए मिलने वाली छुट्टी के दिन का महत्व शायद पता चल जाता है लेकिन दुसरे धर्म के बच्चों के लिए पर्व-त्यौहार की छुट्टी  का मतलब है मौज-मस्ती का दिन | कितना अच्छा होता अगर मुसलमान बच्चों को भी पता होता की दिवाली राम जी के आयोध्या लौटने की ख़ुशी में मनाया जाने वाला पर्व है जिसका मतलब है अँधेरे पर उजाले अर्थात असत्य पर सत्य की जीत | या फिर हिन्दू , ईसाई या सिख बच्चों को पढाया जाता कि ईद-उल-फितर, शबेबारात या रमज़ान का क्या महत्व है ? गुड फ्रायडे, नानक जयंती या बुद्ध पूर्णिमा का महत्त्व सभी धर्म के बच्चों को पढ़ाया जाता तो बचपन से ही सभी धर्मों के प्रति एहतराम पैदा होता | इस तरह से शिक्षित बच्चे जब बड़े होते  तो पूरी जिम्मेवारी से सभी धर्मों के को सम्मान की नजर से देखते और देश के अच्छे नागरिक बनते | 

इस देश में मुसलामानों की जनसंख्या बीस प्रतिशत से भी कम है | इसका मतलब यह हुआ की एक गैर मुस्लिम होने के नाते अगर मेरे सौ दोस्त हैं तो उनमें बीस मुस्लिम भी हो तब तो मैं कह सकता हूँ कि मैं मुस्लिम समाज को समझने में रूचि रखता हूँ या ऐसा कहने का मुझे हक भी है | दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग ऐसा नहीं कर पाते और नतीजा यह होता है कि बेबुनियाद आक्षेप और मनमुटाव पनपने लगते हैं | रही सही कसर जहर फैलाकर कट्टरपंथी संगठन पूरी कर देते हैं |

एक और बात है कि क्या मुसलामानों की मौजूदा हालात के लिए मुस्लिम समाज के अंदरूनी कारण भी जिम्मेवार हैं ? कुछ ही दिनों पहले मैनें एक आर्टिकल फेसबुक पर लिखा था जो कि फतवों के बारे में था | कुछ प्रगतिशील मुस्लिम भाईयों नें उस लेख का स्वागत किया लेकिन ऐसे भी मुसलमान भाई और मौलवी थे जिन्होंने कहा कि इस्लामिक विषयों पर लिखने का मुझे कोई हक ही नहीं है | मैं समझता हूँ कि कौम के ऐसे   दकियानूस मौलवी, जो इस्लाम को अपनी मल्कियत समझते हैं, भी जिम्मेवार हैं भारत में मुसलामानों के पिछड़ेपन के लिए | तालीम से ज्यादा धनराशी भव्य भवन-निर्माण में धड़ल्ले से खर्च किया जा रहा है | बात-बात पर अजीबोगरीब फतवे जारी कर दिए जाते हैं | कई फतवे मजहबी पंडितों के लिए वाजिब जरूर लगते होंगे लेकिन एक आम मज़हबपरस्त इंसान के लिए जी का जंजाल भी बन जाते हैं | मौलानाओं द्वारा जारी फतवे भी कमाल के होते हैं जैसे ''दवा में अल्कोहल का इस्तेमाल हराम है'' , या ''औरतों को नौकरी नहीं करनी चाहिए'', या ''कैमरेवाले मोबाईल गैर-इस्लामी हैं'', या ''लड़के-लड़कियों की पढाई साथ-साथ नहीं होनी चाहिए'', या इस्लाम टेस्ट-ट्यूब बेबी की इजाजत नहीं देता'' इत्यादि | फ़तवा कोई सामान्य आदेश नहीं होता है बल्कि इसके साथ इसे मानने की पाबन्दी जुडी होती है | इसके साथ-साथ भारतीय मुसलमान समाज आज जात-पात और भेद-भाव के कुचक्र में भी फंस कर पिछड़ रहा है | पसमान्दा मुसलामानों के साथ अपने ही कौम में जबरजस्त भेदभाव बरता जा रहा है | अनेक इदारे और मुस्लिम नेतागण अपने कौम का स्तर उठाने के किये कार्यरत हैं लेकिन सभी प्रयास सूरत-ए-हाल बदलने के लिए नाकाफी हैं | इन सब का नतीजा है कि मुसलामानों में भी प्रतिक्रियावश धर्म परिवर्तन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं | मुसलामानों को सॉफ्ट टार्गेट की तरह क्रिसचन मिशनरियाँ बहुत पहले से ही देखते चली आई हैं | कई अलग पंथों जैसे निरंकारी, डेरा सच्चा सौदा और जुम्मा मसीह वरशिप फेलोशिप आदि मुस्लिम भाई-बहनों को, कुरआन की अपने-अपने ढंग से व्याख्या करके, लुभाते चले आये हैं | और तो और आर.एस.एस. के कुछ भगवा मौलाना कई भारतीय शहरों के मुस्लिम बहुल इलाके की गलियों में घूमकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों का प्रचार कर रहे हैं। ये लोग मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रचार कर रहे हैं। गौरतलब है कि हमेशा से कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाला आरएसएस आज-कल अपने साथ मुसलमानों को जोड़ने की मुहिम चला रहा है।        

भारत निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले लोग
भारत के मुसलमानों को नापाक, संदेह भरी निगाहों से देखने से पहले यह बात सोचने की ज़रूरत है कि चाहे राजनीति हो या कला जगत, खेल हो या साहित्य जगत, शिक्षण हो या कारोबार , मजदूरी हो या कारीगरी, इस देश का हर मुसलामान अपने-अपने तरीके से राष्ट्र निर्माण में ईमानदारी से योगदान दे रहा है | जंग-ए-आज़ादी के दौरान जिस देशभक्त मुस्लिम कौम नें जात-धर्म की परवाह किये बगैर फिरंगियों के नाक में दम कर दिया था, आजाद होते ही उससे कहा गया कि तुम्हारे पास विकल्प है चाहो तो पकिस्तान चले जाओ | हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलामानों नें जिन्ना की जज्बाती बातों से बहुत आगे जाकर यह फैसला किया कि हम इसी भारत में रहेंगे जिसे धर्म के नाम पर बांटा जा रहा है क्यूंकि यही हमारा घर है | इस देश की मिटटी को मुसलामानों नें माथे से लगा लिया और आखरी सांस के बाद इसी मिटटी में दफ़न हो जाने का फैसला किया | हम उन देशभक्त मुसलमानों के वंशजों को संदिग्ध कैसे कह सकते हैं भला ?

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

भगवा मौलाना उगल रहे है जहर

सरेबाज़ार के लिए 
सुशील कुमार 
नई दिल्ली, फ़रवरी 12, 2011 
sarebazar@gmail.com 

खनऊ के मोहम्मद वाहिद चिस्ती जो कर रहे हैं, इस तरह की हिम्मत कुछ कम ही लोग करते हैं। चिस्ती उन 15 'भगवा मौलानाओं' में से हैं, जो शहर के मुस्लिम बहुल इलाके की गलियों में घूमकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों का प्रचार कर रहे हैं। ये लोग मच्चाली महल, मॉडल टाउन और बसई मस्जिद के मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रचार कर रहे हैं। गौरतलब है कि हमेशा से कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाला आरएसएस आज-कल अपने साथ मुसलमानों को जोड़ने की मुहिम चला रहा है।

ये भगवा मौलाना अपने साथ एक पतली सी बुकलेट रखे हुए हैं, इसमें आरएसएस के विचार हैं। इसमें भगवा टेररिजम को लेकर फैलाई जा रही 'अफवाह' और राम जन्मभूमि आंदोलन की 'सही' जानकारी दी गई है।

यह बात अचरज की है लेकिन सच है कि जो खेल हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर खेला जा रहा है , वो बहुत खतरनाक है |   इस देश में लोगों को धर्म के नाम पर गुमराह करना बहुत आसानी से होने लगा है | चाहे धर्मप्रचार हो या धर्म के नाम पर जहर फैलाना, लोग बिना कोई सवाल किये, धार्मिक छुरी से बिना शोर मचाये हलाल होने को तैयार नज़र आते हैं |

वैसे मुसलामानों को टार्गेट की तरह क्रिसचन मिशनरियां बहुत पहले से ही देखते चली आई हैं | कई अलग पंथों जैसे निरंकारी, डेरा सच्चा सौदा और जुम्मा मसीह वरशिप फेलोशिप आदि मुस्लिम भाईयों को, कुरआन की अपने -अपने ढंग से व्याख्या करके, लुभाते चले आये हैं | लेकिन ये भगवा मौलाना कट्टरता की हद तक जा सकते है क्यूंकि संघ कभी भी सहिष्णुता की बात कर ही नहीं सकता |

ये भगवा-मौलाना आम मुसलमान को दिनी बन्दे की तरह दिख रहे है | संघ अपने घिनौने स्वरुप में आ रहा है | ये खाकी निक्कर वाले मौलानाओं और असीमानंद में खास अंतर नहीं है |

बहुत दुःख की बात है कि आम मुसलमान शाहनवाज़ और नकवी की सभाओं में फैज़ टोपी पहने कौम की मौजूदगी दर्ज कराने भर के लिए खिलौने की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं |

कहीं एक-दो जगहों पर नहीं बल्कि देश भर में संध का "गृह संपर्क" अभियान चल रहा है , ये खतरनाक है क्यूंकि इसमें बहरूपियों को अल्लाह-वाला बना कर एक नए तमाशे के लिए षड़यंत्र रचा जा रहा है | हिटलर कहता था कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो सच हो जाता है और संघ अपनी नाजीवादी निति के तहत गुजरात, मालेगांव जैसी घटनाओं को मुसलामानों के मुंह से ही न्यायसंगत कहलवाने का धिनौना खेल खेल रही है|

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

विधायीका बनाम कार्यपालिका

सरेबाज़ार के लिए 
सुशील कुमार 
दिल्ली , 4 फ़रवरी, 2011 
sarebazar@gmail.com
मुझे लोग कहने लगे हैं कि मैं या तो धर्म के दलालों की बात करता हूँ या अंधविश्वासों की | तो आईये आपको आज अलग कहानी सुनाता हूँ | असल में यह कहानी नहीं, हकीकत है | एक फ़िल्मी तर्ज़ की हकीकत | यह राजस्थान के झुंझनूं जिले की ताज़ी बात है | आज से महज साढ़े चार महीने पहले झुंझनूं में एक महिला प्रशासनिक अधिकारी "मुग्धा सिन्हा" कलेक्टर बन कर आयीं | यह ईमानदार कलेक्टर पैसेवालों और नेतागिरी का रौब झाड़ने वालों को अपनी जूती के नोंक पर रखती थीं |अगर कोई काम नियमसम्मत होता हो तो ठीक, वरना फाईल बंद | यही सिद्धांत था मुग्धा सिन्हा का | नेता हो या आम नागरिक, सब एक ही तराजू में तौले जाने लगे लेकिन भला ये बाहुबलियों को कहाँ स्वीकार हो सकता था | बहुत जल्द वह जिले की राजनैतिक और व्यापारिक ठेकेदारों के आँखों की किरकिरी बन गयीं | और सिर्फ चार महीने और कुछ दिन जिले में सेवा करने के बाद एक दिन मुग्धा सिन्हा को पता चला कि उनका ट्रांसफर हो गया |

झुंझुनूं की पहली महिला कलेक्टर मुग्धा सिन्हा के तबादले के बाद विधायक और कलेक्टर में जबानी जंग छिड़ गई है। सूरजगढ़ के विधायक श्रवण कुमार का कहना है कि उन्होंने ही सिन्हा का तबादला करवाया है। उन्होंने कहा कि मैं मुख्यमंत्री और शासन सचिव से मिला था। मुख्यमंत्री हमारे लीडर हैं और हम उनके आदेश का पालन करने वाले हैं। विधायक ने कहा कि कलेक्टर का काम करने का तरीका सही नहीं था। वे बनते काम को भी बीच में लटका देती थीं। कलेक्टर जिले का ‘फेस’ होता है। उसे सांसद, विधायक, चेयरमैन और सरपंचों की बात सुननी ही पड़ती है। पर सिन्हा कहती थीं कि नेता कौन होते हैं।

वहीँ दूसरी तरफ महिला कलेक्टर मुग्धा सिन्हा का कहना है कि मुझे तो काम करना है, इधर करा लो या उधर। परेशान तो वो होते हैं, जो पैसा कमा रहे हों या जिनका परिवार हो, मेरे पास तो कुछ भी नहीं। मैं ऐसी ही हूं, जिद्दी स्वभाव की। मैं अपने हिसाब से काम करती हूं। ना हम किसी के पैर पकड़ते हैं ना नोटों का बक्सा देते हैं। मैं एक दो लोगों के काम करने नहीं आई। हवा में बातें करना मेरा स्टाइल नहीं है। हो सकता है कुछ लोगों को इससे दिक्कत हुई हो। मैं सभ्यता से बात करती हूं, असभ्यता बर्दाश्त नहीं कर सकती।

महज साढ़े चार माह में राजनीतिक कारणों से मुग्धा का तबादला झुंझनूं की जनता को रास नहीं आ रहा। कई संगठनों ने इसका विरोध किया। राष्ट्रीय जन अत्याचार निवारण समिति ने कलेक्टर का तबादला रद्द करने की मांग करते हुए सीएम के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपे, वहीं मंगलवार को नवलगढ़ और मंडावा बंद की घोषणा भी कर दी। नागौर कलेक्टर समित शर्मा के तबादले के बाद भी वहां के लोग सड़कों पर उतर गए थे।

तो ये है हमारा लोकतंत्र, जहाँ हुकुमरान भी सोचता है कि कैसा आदेश दूँ कि लाठी तोड़े बगैर सांप को मार दिया जाये | पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता अचानक इस घटना से याद आ गयी मुझे :
" तुम्हारी मर्जी का हुक्म दूंगा,
ताकि मेरी हुकूमत चलती रहे"

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

देवबंद में प्रगतिशील मौलाना

सरेबाज़ार के लिए 
सुशील कुमार
नई दिल्ली 2, फ़रवरी 2011 
sarebazar@gmail.com
मतौर पर मौलानाओं की छवि (खासकर भारत में) "लकीर का फकीर" या "दकियानूस" मज़हबपरस्त धर्मगुरु की तरह होती जा रही है | मौलाना वह होता है जो दीनी राह पर चलने के सही रास्ते बताता है | ग़लती हो जाने पर फ़तवा जारी कर देता है | और कई बार खुद ये फतवे ही विवादों की वजह बनते नज़र आते हैं | मौलाना वह होता है जो दीनी और दुनियावी दोनों ही लोगों को सही-गलत की पहचान बताता है |

अपने फतवों के कारण हमेंशा चर्चा में रहने वाले 145 साल पुराने दरुम उलूम, देवबंद से जब भी कोई फ़तवा जारी होता है , पूरे मुल्क में चर्च-परिचर्चा शुरू हो जाती है | देवबंद बहुत ही शख्त पाबन्दी वाले फतवों के लिए मशहूर हो चूका है | मौलानाओं द्वारा जारी फतवे भी कमाल के होते हैं जैसे ''दवा में अल्कोहल का इस्तेमाल हराम है'' , या ''औरतों को नौकरी नहीं करनी चाहिए'', या ''कैमरेवाले मोबाईल गैर इस्लामी हैं'', या ''लड़के-लड़कियों की पढाई साथ-साथ नहीं होनी चाहिए'', या इस्लाम टेस्ट-ट्यूब बेबी की इजाजत नहीं देता'' इत्यादि | फ़तवा कोई सामान्य आदेश नहीं होता है बल्कि इसके साथ इसे मानने की पाबन्दी जुडी होती है | हर फ़तवा किसी न किसी सन्दर्भ के साथ, किसी की याचिका पर जारी होता है | कई फतवे मजहबी पंडितों के लिए वाजिब जरूर लगते होंगे लेकिन एक आम मज़हबपरस्त इंसान के लिए कभी-कभी जी का जंजाल भी बन जाते हैं |

देवबंद से अब बदलाव की बयार बहने लगी है | अपने प्रगतिशील विचारों के कारण देवबंद के कुलपति ''मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी'' आजकल खासी चर्चा में हैं | 145 वर्ष पुराने इस संस्थान के वे पहले कुलपति हैं जो उत्तर प्रदेश के बाहर के हैं | वस्तानवी प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति हैं और उन्हें इस बात का भी इल्म है कि आज़ादी की लडाई में देवबंद नें कितनी बड़ी भूमिका निभायी है | वस्तानवी एमबीए हैं और विज्ञान, मेडिकल, इंजिनीयरिंग की पढ़ाई के पक्षधर हैं | अब लोगों का ये भ्रम भी दूर हो जायेगा कि देवबंद में केवल उर्दू, अरबी और फारसी पढ़ाई जाती है |

दरुम उलूम से निकलने वाले नए फतवे अब मुसलामानों को नयी पहचान और दिशा दे सकते हैं जैसे "मुस्लिम किसी को भी वोट देने के लिए आज़ाद हैं" और "वे चाहें तो वन्दे मातरम गा सकते हैं " आदि | शिक्षाविद होने के साथ-साथ वस्तानवी एक कुशल संगठनकर्ता भी है| उनहोंने पूरे भारत में मदरसों का बड़ा नेटवर्क खड़ा किया है | वे मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड के सदस्य भी हैं | उन्हें महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित 'मौलाना अबुल कलाम अवार्ड से नवाज़ा जा चुका है | कुलपति का पद संभालने के बाद ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि अब फतवे विस्तृत रूप से जारी किये जायेंगे क्योंकि कई बार फतवों की गलत व्याख्या भी कर दी जाती है | इसके लिए अब इन्टरनेट का भी सहारा लिया जायेगा ताकि फतवे सही रूप में लोगों तक पहुच सके |

लेकिन आगे के बजाय पीछे देखने वाले लोगों की आँखों में वस्तानवी किरकिरी की तरह चुभने लगे हैं | कुछ लकीर के फकीर मौलाना वस्तानवी के इस्तीफे की मांग कर रहें हैं | हालाँकि दुनिया भर में वस्तानवी के विरोधियों की बड़ी भार्त्स्रना हो रही है | मलेशिया नें साफ़ कह दिया है कि अगर वस्तानवी को इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया तो देवबंद के छात्रों का नामांकन मलेशिया में नहीं होने दिया जायेगा | स्वयं मौलाना वस्तानवी विरोधियों को करारा जवाब देते हुए कहा है कि वे इतनी आसानी से इस्तीफा देने वाले नहीं हैं |

अभी देवबंद को मौलाना वस्तानवी जैसे प्रगतिशील नेतृत्वकर्ता की जरुरत है |