शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

विधायीका बनाम कार्यपालिका

सरेबाज़ार के लिए 
सुशील कुमार 
दिल्ली , 4 फ़रवरी, 2011 
sarebazar@gmail.com
मुझे लोग कहने लगे हैं कि मैं या तो धर्म के दलालों की बात करता हूँ या अंधविश्वासों की | तो आईये आपको आज अलग कहानी सुनाता हूँ | असल में यह कहानी नहीं, हकीकत है | एक फ़िल्मी तर्ज़ की हकीकत | यह राजस्थान के झुंझनूं जिले की ताज़ी बात है | आज से महज साढ़े चार महीने पहले झुंझनूं में एक महिला प्रशासनिक अधिकारी "मुग्धा सिन्हा" कलेक्टर बन कर आयीं | यह ईमानदार कलेक्टर पैसेवालों और नेतागिरी का रौब झाड़ने वालों को अपनी जूती के नोंक पर रखती थीं |अगर कोई काम नियमसम्मत होता हो तो ठीक, वरना फाईल बंद | यही सिद्धांत था मुग्धा सिन्हा का | नेता हो या आम नागरिक, सब एक ही तराजू में तौले जाने लगे लेकिन भला ये बाहुबलियों को कहाँ स्वीकार हो सकता था | बहुत जल्द वह जिले की राजनैतिक और व्यापारिक ठेकेदारों के आँखों की किरकिरी बन गयीं | और सिर्फ चार महीने और कुछ दिन जिले में सेवा करने के बाद एक दिन मुग्धा सिन्हा को पता चला कि उनका ट्रांसफर हो गया |

झुंझुनूं की पहली महिला कलेक्टर मुग्धा सिन्हा के तबादले के बाद विधायक और कलेक्टर में जबानी जंग छिड़ गई है। सूरजगढ़ के विधायक श्रवण कुमार का कहना है कि उन्होंने ही सिन्हा का तबादला करवाया है। उन्होंने कहा कि मैं मुख्यमंत्री और शासन सचिव से मिला था। मुख्यमंत्री हमारे लीडर हैं और हम उनके आदेश का पालन करने वाले हैं। विधायक ने कहा कि कलेक्टर का काम करने का तरीका सही नहीं था। वे बनते काम को भी बीच में लटका देती थीं। कलेक्टर जिले का ‘फेस’ होता है। उसे सांसद, विधायक, चेयरमैन और सरपंचों की बात सुननी ही पड़ती है। पर सिन्हा कहती थीं कि नेता कौन होते हैं।

वहीँ दूसरी तरफ महिला कलेक्टर मुग्धा सिन्हा का कहना है कि मुझे तो काम करना है, इधर करा लो या उधर। परेशान तो वो होते हैं, जो पैसा कमा रहे हों या जिनका परिवार हो, मेरे पास तो कुछ भी नहीं। मैं ऐसी ही हूं, जिद्दी स्वभाव की। मैं अपने हिसाब से काम करती हूं। ना हम किसी के पैर पकड़ते हैं ना नोटों का बक्सा देते हैं। मैं एक दो लोगों के काम करने नहीं आई। हवा में बातें करना मेरा स्टाइल नहीं है। हो सकता है कुछ लोगों को इससे दिक्कत हुई हो। मैं सभ्यता से बात करती हूं, असभ्यता बर्दाश्त नहीं कर सकती।

महज साढ़े चार माह में राजनीतिक कारणों से मुग्धा का तबादला झुंझनूं की जनता को रास नहीं आ रहा। कई संगठनों ने इसका विरोध किया। राष्ट्रीय जन अत्याचार निवारण समिति ने कलेक्टर का तबादला रद्द करने की मांग करते हुए सीएम के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपे, वहीं मंगलवार को नवलगढ़ और मंडावा बंद की घोषणा भी कर दी। नागौर कलेक्टर समित शर्मा के तबादले के बाद भी वहां के लोग सड़कों पर उतर गए थे।

तो ये है हमारा लोकतंत्र, जहाँ हुकुमरान भी सोचता है कि कैसा आदेश दूँ कि लाठी तोड़े बगैर सांप को मार दिया जाये | पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता अचानक इस घटना से याद आ गयी मुझे :
" तुम्हारी मर्जी का हुक्म दूंगा,
ताकि मेरी हुकूमत चलती रहे"

1 टिप्पणी:

  1. में कुछ नहीं कह सकता की जो कुछ हुआ वह अच्छा हुआ या बुरा; लेकिन बहुमत के हिसाब से थोडा सा निष्कर्ष निकालता हु की............ अच्छा नहीं हुआ, यह बेईमानो का देश है; यहा किसी पर भी विश्वाश करना जैसे सांप को दूध पिलाने जैसा है, में तिन-चार घंटे नेट पर खर्च करू हु लेकिन सब बेकार है सब बोले है की यो करो बो करो लेकिन करे कोई किमी ही कोणी.................... प्रधान मंत्री भी बोले है की यो होनो चाहिए . और राष्ट्रपति भी बोले है की यो होनो चाहिए .सब बेईमान................ धनि को धनि कुन है ? एकदम ही अन्याय होगो आज टीवी पर सुनकर की सिर्फ १८ करोड़ ही स्विस बैंक में है ... बेशर्म शारी विधायिका ही बेईमान है ......... स्विस से और LGT बैंक से सारो धन बेईमान निकालकर लेगा............कितनी बेशर्मी है ? सारा हिन्दुस्तानी नपुसंक है ....................... यानि जया की जब तक दुनिया में एक भी मुर्ख जिन्दो रवेगो कोई बी भूखो कोणी मरेगो........... इया ही तब तक भारत में आपा रहगा जब तक नेता मला-मॉल होता रहंगा ..............

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