शनिवार, 28 नवंबर 2015

स्त्रीविरोधी मानसिकता के खिलाफ हैप्पी टू ब्लीड अभियान




सुशील स्वतंत्र 

पुरानी परंपरा के नाम पर केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 साल से बड़ी लड़की और 50 साल से छोटी स्त्री का प्रवेश प्रतिबंधित है| इसके पीछे बहुत ही ओछी और घिनौनी मानसिकता है कि महिलाएं मंदिर को अपवित्र कर देंगी क्यूंकि यह पता लगाना मुश्किल है कि किसी महिला का मन्दिर प्रवेश के समय मासिक धर्म चल रहा है या नहीं| मंदिर प्रशासन ने इसलिए सीधे-सीधे 10 साल से बड़ी लड़की और 50 साल से छोटी स्त्री के मंदिर में प्रवेश पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया| 2006 में कन्नड़ अदाकारा जयामाला ने मंदिर में प्रवेश करने और मूर्तियों को छूने का दावा किया था| इस बात पर बहुत हंगामा हुआ था| मन्दिर प्रशासन ने जयामाला पर मुकदमा भी दर्ज़ करवा दिया था| इसके बाद दिसम्बर 2011 में आंध्र प्रदेश की रहने वाली 35 वर्षीय सरस्वती ने भी मंदिर में प्रवेश किया और इस बात पर बड़ा हंगामा हुआ|

फिर एक बार सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश का मामला गर्म तब हो गया जब त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने कहा कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति तभी दी जाएगी जब उनकी शुद्धता की जांच करने वाली मशीन का आविष्कार हो जाएगा| यह बात पर देशभर की महिलाओं ने ऐतराज जताया| पटियाला की रहने वाली निकिता आज़ाद ने फेसबुक पर एक मुहिम शुरू की है, जिसका नाम दिया - 'हैप्पी टू ब्लीड' | फेसबुक पर हैश टैग #HappyToBleed टाईप करके इस अभियान तक पहुंचा जा सकता है| इस अभियान के माध्याम से निकिता ने सभी महिलाओं से अपील की गई कि वे मासिक धर्म को लेकर पुरुषवादी घिनौनी मानसिकता का जवाब दें और वो चार्टपेपर या सेनिटरी नैपकिन लेकर अपनी तस्वीर पोस्ट करें ताकि सदियों पुराने इस पितृसत्तात्मक समाज के शर्मिंदा करने वाले इस खेल का विरोध किया जा सके| देखते ही देखते यह मुहीम सोशल मीडिया में वायरल हो गई| प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई| स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर इस मुहीम के समर्थन और ब्राह्मणवादी स्त्रीविरोधी मानसिकता के खिलाफ तस्वीरें और कमेन्ट पोस्ट किए| इतना ही नहीं बड़ी संख्या में पुरुषों ने भी स्त्रियों के सम्मान और अधिकार के लिए इस अभियान का समर्थन किया| मासिक धर्म को लेकर समाज महिलाओं को हीन दृष्टि से न देखे, इन भ्रांतियों और अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ संभवतः पहली बार सोशल मीडिया पर भारतीय महिलाएं इतनी मुखर नजर आ रही हैं| 












इस संवेदनशील मसले पर बात करते हुए कुछ सवाल ऐसे हैं जिसका जवाब धर्म के इन तथाकथित झंडाबरदारों से लेना जरूरी है : 



  1. क्या कारण है कि कोई स्त्री, जिसे मासिक धर्म के दौरान रक्तस्त्राव होने के कारण अपवित्र मानकर सबरीमाला जैसे प्रसिद्द मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं दिया जाता है, उसी स्त्री के गर्भ में पूरे नौ महीने उसी तथाकथित गंदे खून में पलने वाले बच्चे को यही समाज स्वीकार कर लेता है?
  2. पवित्रता और अपवित्रता की परिभाषा गढ़ने का अधिकार किसको है, यह कौन तय करेगा?  
  3. स्त्री को कुदरत ने गर्भाशय दिया है, क्या इसमें औरत का क्या दोष है?
  4. जिस प्रक्रिया से मानवजाति की उत्पत्ति होती है, उसे अपवित्र कहने का हक़ किसी मन्दिर प्रशासन को किसने दिया?
  5. जहाँ एक ओर हिन्दू 52 शक्तिपीठों में से एक कामख्या में योनी की पूजा करते हैं, वही केरल के प्रसिद्द सबरीमाला मन्दिर में मासिक धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रवेश क्यूँ नहीं करने देते? 
    




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